(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

Aadiparv (Mahabharat) - आदिपर्व (महाभारत)


॥ श्रीः ॥
1.199. अध्यायः 199
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Topics
अर्जुनेन अनुरूपपुरोहितसंपादनं पृष्टेन गन्धर्वेण धौम्यवरणाक्ष्यनुज्ञा॥ 1 ॥ गन्धर्वाय आग्नेयास्त्रदानम्॥ 2 ॥ उत्को चतीर्थे पाण्डवैः धौम्यस्य पौरोहित्ये वरणम्॥ 3 ॥
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Text

अर्जुन उवाच। 1-199-0x(1126)(8831)
अस्माकमनुरूपो वै यः स्याद्गन्धर्व वेदवित्।
पुरोहितस्तमाचक्ष्व सर्वं हि विदितं तव॥ 1-199-1(8832)
गन्धर्व उवाच। 1-199-2x(1127)
यवीयान्देवलस्यैष वने भ्राता तपस्यति।
धौम्य उत्कोचके तीर्थे तं वृणुध्वं यीच्छथ॥ 1-199-2(8833)
वैशम्पायन उवाच। 1-199-3x(1128)
ततोऽर्जुनोऽस्त्रमाग्नेयं प्रददौ तद्यथाविधि।
गन्धर्वाय `स च प्रीतो वचनं चेदमब्रवीत्॥ 1-199-3(8834)
मयि सन्ति हयश्रेष्ठास्तव दास्यामि वै सखे।
उपकारकृतं मित्रं प्रतिकारेण योजये॥ 1-199-4(8835)
गृह्णीष्व चाक्षुषीं विद्यामिमां भरतसत्तम।
एवमुक्तोऽर्जुनः' प्रीतो वचनं चेदमब्रवीत्॥ 1-199-5(8836)
त्वय्येव तावत्तिष्ठन्तु हया गन्धर्वसत्तम।
कार्यकाले ग्रहीष्यामः स्वस्ति तेऽस्त्विति चाब्रवीत्॥ 1-199-6(8837)
तेऽन्योन्यमभिसंपूज्य गन्धर्वः पाण्डवाश्च ह।
रम्याद्भागीरथीतीराद्यथाकामं प्रतस्थिरे॥ 1-199-7(8838)
तत उत्कोचकं तीर्थं गत्वा धौम्याश्रमं तु ते।
तं वव्रुः पाण्डवा धौम्यं पौरोहित्याय भारत॥ 1-199-8(8839)
तान्धौम्यः प्रतिजग्राह सर्ववेदविदां वरः।
वन्येन फलमूलेन पौरोहित्येन चैव ह॥ 1-199-9(8840)
ते समाशंसिरे लब्धां श्रियं राज्यं च पाण्डवाः।
ब्राह्मणं तं पुरस्कृत्य पाञ्चालीं च स्वयंवरे॥ 1-199-10(8841)
पुरोहितेन तेनाथ गुरुणा संगतास्तदा।
नाथवन्तमिवात्मानं मेनिरे भरतर्षभाः॥ 1-199-11(8842)
स हि वेदार्थतत्त्वज्ञस्तेषां गुरुरुदारधीः।
वेदविच्चैव वाग्मी च धौम्यः श्रीमान्द्विजोत्तमः॥ 1-199-12(8843)
तेजसा चैव बुद्ध्या च रूपेण यशसा श्रिया।
मन्त्रैश्च विविधैर्धौम्यस्तुल्य आसीद्बृहस्पतेः॥ 1-199-13(8844)
स चापि विप्रस्तान्मेने स्वभावाभ्यधिकान्भुवि।
तेन धर्मविदा पार्था योज्या सर्वविदा वृताः॥ 1-199-14(8845)
मेनिरे सहिता वीराः प्राप्तं राज्यं च पाण्डवाः।
बुद्धिवीर्यबलोत्साहैर्युक्ता देवा इवापरे॥ 1-199-15(8846)
कृतस्वस्त्ययनास्तेन ततस्ते मनुजाधिपाः।
मेनिरे सहिता गन्तुं पाञ्चाल्यास्तं स्वयंवरम्॥ ॥ 1-199-16(8847)

इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि एकोनद्विशततमोऽध्यायः॥ 199 ॥ ॥ समाप्तं चैत्ररथपर्व ॥


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